राजा ने मूर्ति के हृदय पर हाथ रखा तो ऐसे लगा कि सांस ले रहे हैं भगवान राम, पढ़िए बीजापुर रियासत के सीताराम मंदिर की स्थापना से जुड़ी अनूठी कथा

राजा ने मूर्ति के हृदय पर हाथ रखा तो ऐसे लगा कि सांस ले रहे हैं भगवान राम, पढ़िए बीजापुर रियासत के सीताराम मंदिर की स्थापना से जुड़ी अनूठी कथा

राजा ने मूर्ति के हृदय पर हाथ रखा तो ऐसे लगा कि सांस ले रहे हैं भगवान राम, पढ़िए बीजापुर रियासत के सीताराम मंदिर की स्थापना से जुड़ी अनूठी कथा

नंदकिशोर परिमल/ गुलेर
स्वतंत्रता पूर्व भारत वर्ष का पूरा भू- भाग अनेक रियासतों, मिस्लों अथवा जागीरों में बंटा हुआ था। आजादी प्राप्त करने के पश्चात सरदार बल्लभ भाई पटेल, जो उस समय गृहमंत्री थे, उनके अनथक प्रयास के कारण इन सभी रियासतों का विलय कर के एक राष्ट्र की नींव पड़ी।
हिमाचल प्रदेश भी आजादी से पहले अनेक रियासतों और जागीरों में बंटा हुआ था। कांगड़ा जिला में भी छोटी- बड़ी अनेक रियासतें थीं। इनमें कांगड़ा, नूरपुर, गुलेर, डाडा सीबा, सुजानपुर, लंबागांव, जयसिंहपुर और बीजापुर आदि प्रमुख थीं।
इस आलेख में हम लंबागांव, सुजानपुर और जयसिंहपुर के साथ सिमटे हुए जागीर क्षेत्र बीजापुर की चर्चा करेंगे और वहां विराजमान सीताराम मंदिर पर प्रकाश डालेंगे।
बीजापुर रियासत की स्थापना
बताया जाता है कि 1660 ई में राजा विजय चंद ने इस छोटे से भूभाग पर चालीस घरों में सिमटी हुई जागीर को बीजापुर रियासत के रूप में बसाया था। प्रकृति की गोद में बसा हुआ यह क्षेत्र एक ऊंचे टीले पर स्थित है।
कुछ दूरी पर कल- कल करती बहती हुई व्यास नदी इस क्षेत्र को और भी आकर्षक बना देती है। राजा विजय चंद ने 1660 से 1697 ई तक इस रियासत पर राज किया, परंतु अब यहां स्थित किला और महल खंडहरों में परिवर्तित हो चुके हैं।
सीताराम मंदिर की स्थापना
अब बीजापुर का मुख्य आकर्षण यदि कुछ है तो वह है वहां स्थापित सीताराम जी का दुर्लभ मंदिर। इस मंदिर में भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण जी के काले रंग के विग्रह स्थापित हैं। यह भव्य मूर्तियां देश के विभिन्न भागों से श्रध्दालुओं को बरबस अपनी ओर खींच लाती हैं।
कहते हैं कि राजा विजय चंद को सपने में सीताराम और लक्ष्मण जी के विग्रह मंदिर में स्थापित करने का आदेश मिला। उन्हें बताया गया कि निकटवर्ती हारसीपत्तन (काथला- बेई) गांव के साथ व्यास नदी की गहराई में काले रंग की सीता, राम और लक्ष्मण जी के चित्रों वाली शिला को निकाल कर, उन्हें तराशने के बाद इन मूर्तियों को मंदिर में स्थापित किया जाए।
राजा खुद कंधा देकर मूर्ति लाया राजा
अगले ही दिन राजा अपने अनुचरों सहित उपरोक्त स्थल पर पहुंचा। व्यास नदी की गहराई से शिला को निकाल कर और तराश कर भव्य मूर्तियां तैयार हुईं। अब इन मूर्तियों को उठाकर बीजापुर ले जाने की बात आई तो मूर्तिकारों और अनेक श्रध्दालुओं से ये उठाई नहीं जा सकीं।
राजा उहापोह की स्थिति में था कि रात को फिर सपने में स्वयं जाकर लाने का आदेश मिला। अब राजा बाजे- गाजे के साथ उक्त स्थान पर पहुंचा और स्वयं कंधा लगा कर मूर्तियों को बीजापुर मंदिर में लाकर स्थापित कर दिया। मंत्रोच्चारण के साथ मूर्तियों को जीवनदान दिया गया। अब राजा को विश्वास नहीं हो रहा था कि मूर्तियों में जीवदान पड़ा कि नहीं।
और सांस लेने लगी मूर्ति
राजा भगवान से यह विश्वास दिलाने का हठ करने लगा। रात को सपने में भगवान ने राजा से कहा कि जानना ही चाहते हो तो मूर्ति के हृदय पर हाथ रख कर पता लगा लो। अगले दिन राजा ने हाथ रखकर देखा तो पाया कि भगवान राम ने दो बार श्वास लिया।
इससे यह पता चलता है कि ये मूर्तियां कितनी सजीव और साक्षात हैं। इनके दर्शन करने पर व्यक्ति भाव विभोर होकर मस्ती में झूमने लगता है। मंत्रमुग्ध होकर श्रध्दालु यहीं खोकर रह जाता है।
हनुमानजी की मूर्ति की कथा
सीताराम मंदिर के प्रांगण में हनुमानजी की भव्य मूर्ति की स्थापना की गई है। किंवदन्ती अनुसार मुगलों के आक्रमण के समय में मूर्ति के हाथ-पैर काट दिए गए। मुगलों द्वारा ऐसा दुर्व्यवहार होने पर उस सजीव विग्रह के नाक और कानों में से यकायक रंगड़ निकलने लगे। रंगड़ो के काटने से आक्रमणकारियों का सफाया हो गया। आज भी उसी रूप में हनुमान जी की मूर्ति आकर्षित करती मिलती है।
मंदिर में माता दुर्गा की भव्य मूर्ति
सीताराम मंदिर में स्थापित माता दुर्गा की भव्य मूर्ति भी श्रध्दालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र है। कहते हैं किसी भी प्रकार के असाध्य रोग पीड़ित बच्चे यहां माता के आशीर्वाद से रोगमुक्त होकर परिवार की खुशियां लेकर घर लौटते हैं।
वर्तमान में मंदिर के रख- रखाव की व्यवस्था
मंदिर परिसर में पूजा-अर्चना के लिए स्थायी तौर पर पुजारी की व्यवस्था है। पुजारी मंदिर के कमरे में निवास करते हैं। कहा जाता है कि यहां मंदिर में चार बार आरती और भोग लगाने का प्रावधान है।
यही नहीं, चैत्र नवरात्रि और अन्य उत्सव भी बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाए जाते हैं। इस अवसर पर विशाल भंडारा लगता है और दूर- दूर से श्रध्दालु सीताराम मंदिर में अपनी हाजिरी लगाने पहुंचते हैं।
पर्यटन की संभावनाएं
बीजापुर का अति रमणीक और सुन्दर स्थल आज भी विकास के क्षेत्र में अति अविकसित और पिछड़ा हुआ है। मूलभूत सुविधाओं की कमी होने के कारण पर्यटकों को पहुंचने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है। मंदिर में भले ही पीने के पानी और बिजली की व्यवस्था सराहनीय है, परंतु सड़क, संचार और परिवहन सुविधाएं नाममात्र भी नहीं हैं।
यही नहीं, श्रध्दालुओं के लिए इतना दूर आने पर अल्पाहार हेतु चाय- पान आदि की कोई व्यवस्था नहीं है। प्रदेश सरकार को पर्यटन विकास के दृष्टिगत मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने का प्रावधान करना होगा। श्रध्दालुओं को रात्री विश्राम के लिए सुविधा जुटाना भी अपेक्षित है। पर्यटकों को आकर्षित करके जहां सरकार की आर्थिकी में सुधार होगा, वहीं स्थानीय लोगों को भी घर- द्वार पर रोजगार के अवसर पर प्राप्त हो सकेंगे।
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Jyoti maurya

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