जब भारतीय महिलाएं बनारसी या रेशमी साड़ियां पहनती थीं, जुब्बल शाही घराने की ऊर्मिला देवी ने ‘निवी शैली’ की साड़ी पहन उठाया था क्रांतिकारी कदम
जब भारतीय महिलाएं बनारसी या रेशमी साड़ियां पहनती थीं, जुब्बल शाही घराने की ऊर्मिला देवी ने ‘निवी शैली’ की साड़ी पहन उठाया था क्रांतिकारी कदम
विनोद भावुक। शिमला
उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिश उपनिवेशवाद के प्रभाव में भारतीय पोशाक में बदलाव आ रहे थे। उस दौर में साड़ी की ‘निवी शैली’ को लोकप्रिय बनाने में रवींद्रनाथ ठाकुर की भाभी ज्ञानदानंदिनी देवी का सबसे बड़ा योगदान था, लेकिन जुबबल शाही घराने की अपने समय की खूबसूरत महिला ऊर्मिला देवी ने इसे अपनाकर इसे सामाजिक स्वीकार्यता दिलाई।
इतिहास के पन्नों में जुबबल रियासत की ऊर्मिला देवी को कमर के चारों ओर साड़ी लपेटकर एक छोर (पल्लू) को कंधे के ऊपर से ले जाने वाली निवी शैली में साड़ी पहनने के लिए जाना जाता है। यह साड़ी पहनने की वह शैली है, जिसे आज पूरे भारत में सबसे आम रूप में देखा जाता है। हालांकि वह जुब्बल की रानी नहीं थीं। उनकी शादी जुब्बल के कंवर बीरेंद्र सिंह से हुई थी।
शाही पोशाक में आधुनिकता का समावेश
1930 और 1940 के दशक में जब हॉलीवुड फिल्मों का जादू पूरी दुनिया पर छा रहा था, ऊर्मिला ने उस वैश्विक फैशन को भारतीय परिधानों से जोड़ा। ऊर्मिला देवी उन पहली शाही घराने की महिलाओं में से एक थीं, जिन्होंने पारंपरिक शाही पोशाक में आधुनिकता का समावेश किया। ऊर्मिला देवी की उस दौर की तस्वीरें और शैली आज भी फैशन इतिहासकारों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है।
उनकी एक तस्वीर विशेष रूप से प्रसिद्ध है, जिसमें वह शिफॉन की भारतीय साड़ी पहने हुए हैं। यह साड़ी हॉलीवुड की अभिनेत्रियों के शाम के गाउन से प्रेरित बताई जाती है। उस दौर में जब भारतीय महिलाएं ज्यादातर पारंपरिक बनारसी या दक्षिण भारतीय रेशमी साड़ियां पहनती थीं, ऊर्मिला देवी का यह प्रयोग सचमुच क्रांतिकारी कदम था।
छोटी रियास में बड़ा कदम
जुब्बल रियासत छोटी लेकिन ऐतिहासिक रियासतों में से एक थी। यह रियासत शिमला के पास बसी थी और अपनी प्राकृतिक सुंदरता और सांस्कृतिक धरोहर के लिए जानी जाती थी। ऊर्मिला देवी ने अपने पहरावे से इसी रियासत की शोभा बढ़ाई। उनकी तस्वीरें आज विभिन्न ऐतिहासिक अभिलेखागारों और विकिपीडिया जैसे ज्ञानकोषों में मौजूद है।
बांग्ला विकिपीडिया पर साड़ी लेख में उनकी तस्वीर को ‘निवी शैली में जुब्बल की महारानी ऊर्मिला देवी’ के शीर्षक से शामिल किया गया है। ऊर्मिला देवी की विशेषता यह थी कि उन्होंने उस पश्चिमी प्रभाव को पूरी तरह अपनाने के बजाय भारतीय परिधान के ढांचे में समाहित किया। शिफॉन की साड़ी शाम के गाउन के समान प्रभाव पैदा करती थी, लेकिन साड़ी का भारतीय स्वरूप बरकरार रहता था।
आज भी प्रासंगिक है विरासत
ऊर्मिला देवी आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी फैशन विरासत आज भी जीवित है। आज जब भारतीय महिलाएं रेड कार्पेट पर या शादी-ब्याह में शिफॉन और जॉर्जेट की साड़ियाँ पहनती हैं, तो वह अनजाने में उस परंपरा को आगे बढ़ा रही होती हैं जिसकी नींव ऊर्मिला देवी जैसी उस दौर की अग्रणी महिलाओं ने रखी थी।
ऊर्मिला देवी ने साबित किया कि परंपरा और आधुनिकता में कोई विरोध नहीं है। दोनों का सुंदर संगम एक नई और समृद्ध संस्कृति का निर्माण कर सकता है। ऊर्मिला देवी ने पारंपरिक भारतीय साड़ी और आधुनिक पश्चिमी शैली के समन्वय से एक नया फैशन स्टेटमेंट गढ़ा। उनका यह फैशन स्टेटमेंट आज भी उनकी यादें ताज़ा रखे है।
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