कौन थी रानी प्राग, जिसका बसाया प्रागपुर है भारत का पहला हेरिटेज विलेज?
कौन थी रानी प्राग, जिसका बसाया प्रागपुर है भारत का पहला हेरिटेज विलेज?
विनोद भावुक। प्रागपुर
कांगड़ा की ऐतिहासिक वादियों में बसी प्राग देवी की कथा आज भी लोगों के जहन में जीवित है। जसवां रियासत की यह सुंदर राजकुमारी न केवल अपनी राजसी शान के लिए प्रसिद्ध थीं, बल्कि उनकी दूरदर्शिता और समाज सेवा के दृष्टिकोण ने उन्हें कांगड़ा की ऐतिहासिक विरासत में अमर बना दिया। प्रागपुर की हवेलियों में चार सौ साल पुरानी ईंटों और लकड़ी की नक्काशी आज भी राजकुमारी प्राग की सोच और कला की गवाही देती हैं।
कहा जाता है कि प्राग देवी ने एक तपस्वी के आशीर्वाद और उसके मार्गदर्शन से प्रागपुर नामक नगर की स्थापना की। यही नगर आज भारत का पहला हेरिटेज विलेज कहलाता है। प्रागदेवी की यह दूरदर्शिता और सोच आज भी पर्यटकों और इतिहास प्रेमियों को आकर्षित करती है।
प्राग देवी का व्यक्तित्व और कृतित्व
संतान न होने के बावजूद प्राग देवी ने समाज और संस्कृति के लिए स्थायी योगदान देने का निर्णय लिया। प्रगपुर में हवेलियों, गलियों और मंदिरों का निर्माण उनकी संस्कृति के प्रति प्रेम और आस्था की झलक देता है।
नगर की स्थापना के बाद प्राग देवी ने अपने क्षेत्रवासियों के लिए शिक्षा, धर्म और सांस्कृतिक जीवन को प्रोत्साहित किया। प्रागपुर की गलियाँ और हवेलयां पारंपरिक स्थापत्य कला और स्थानीय शिल्प कौशल का जीवंत उदाहरण हैं।
बेजोड़ निर्माण कला की गवाही
प्रागपुर न केवल ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह पर्यटन का भी प्रमुख केंद्र बन चुका है। द जजेज़ कोर्ट जैसे हेरिटेज होटल प्रागदेवी की विरासत का अनुभव करने वालों के लिए शानदार आतिथ्य प्रदान करते हैं।
प्रागदेवी की नगर निर्माण की प्रेरक कहानी आज भी प्रागपुर को एक पवित्र, सौभाग्यपूर्ण और सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध स्थल बनाती है। यह इस बात की भी गवाह है कि प्रागपुर की पारंपरिक निर्माण कला बेजोड़ थी।
राजकुमारी की यादगार में बसा गांव
इतिहासकारों के मुताबिक, राजकुमारी प्रागदेवी का कोई वास्तविक चित्र उपलब्ध नहीं है, क्योंकि उनके जीवनकाल के दौरान चित्रकला की सीमित उपलब्धता और ऐतिहासिक दस्तावेजों की कमी के कारण उनका चित्रण संभव नहीं हो पाया।
हालांकि, प्रागदेवी की विरासत और योगदान को संरक्षित करने के लिए प्रागपुर गाँव की स्थापना की गई, जिसे भारत का पहला हेरिटेज विलेज माना जाता है। यह गाँव उनकी याद में बसाया गया था और आज भी उनकी सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है।
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