कुल्लू की घाटी में बसी विश्व-चेतना: जब एक रूसी कलाकार ने हिमालय को अपना घर बना लिया
कुल्लू की घाटी में बसी विश्व-चेतना: जब एक रूसी कलाकार ने हिमालय को अपना घर बना लिया
विनोद भावुक। कुल्लू
देवभूमि हिमाचल की कुल्लू घाटी केवल प्राकृतिक सौंदर्य और पर्यटन के लिए नहीं जानी जाती, बल्कि यह वह धरती भी है जहाँ विश्व कला, अध्यात्म और शांति आंदोलन ने स्थायी ठिकाना बनाया। इस वैश्विक कथा का केंद्र हैं रूसी कलाकार, दार्शनिक और शांतिदूत निकोलस रोरिख, जिन्होंने अपने जीवन का अंतिम अध्याय कुल्लू के नग्गर में लिखा।
9 अक्तूबर 1874 को रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में जन्मे निकोलस रोरिख का जीवन कई महाद्वीपों से होकर गुज़रा, लेकिन पश्चिम हिमालय की कुल्लू घाटी उनकी आत्मा का अंतिम निवास बना। 13 दिसंबर 1947 को उनका निधन नग्गर में हुआ। आज भी नग्गर का रोरिख एस्टेट म्यूजियम उनकी स्मृति और कृतित्व का जीवंत प्रमाण है।

हिमालय सिर्फ़ पहाड़ नहीं, दर्शन
नग्गर में रहते हुए रोरिख ने बैनर ऑफ पीस और रोरिख फ़ैक्ट की अवधारणा को मजबूत किया। यह वही अंतरराष्ट्रीय समझौता है जिस पर 1935 में व्हाइट हाउस में अमेरिका सहित कई देशों ने हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते का उद्देश्य युद्ध के समय भी कला, संस्कृति और धरोहरों की रक्षा था। इसके लिए रोरिख को कई बार नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया।

नेहरू, इंदिरा गांधी और कुल्लू
1942 में जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी ने कुल्लू स्थित रोरिख निवास पर उनसे भेंट की थी।
कुल्लू घाटी ने जिस कलाकार को अपनाया, उसने बदले में हिमालय को विश्व मानचित्र पर आध्यात्मिक कला का प्रतीक बना दिया। कुल्लू की पहचान को स्थानीय से वैश्विक बनाने वाले निकोलस रोरिख ने कुल्लू को वैश्विक विचार, कला और शांति का आश्रय बनाने में अपना जीवन होम कर दिया। उनके प्रयासों से कुल्लू विश्व-मानवता की भी भूमि बनी।

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